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जब पुलिस कप्तान के नाम पर फर्जी व्हाट्सऐप अकाउंट बन सकता है, तो सोचिए आम आदमी कितना सुरक्षित है?

आज पलामू में सामने आया मामला सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सिस्टम की बड़ी पोल खोलता है। अगर अपराधी इतने बेखौफ हैं कि वे सीधे पुलिस अधिकारी की पहचान का दुरुपयोग कर सकते हैं, तो आम नागरिक को किसी भी फर्जी केस, ठगी या साजिश में फँसाना उनके लिए कितना आसान हो सकता है — यह सवाल हर व्यक्ति को डराने के लिए काफी है। ❓ क्या हमारी डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है?

जब पुलिस कप्तान के नाम पर फर्जी व्हाट्सऐप अकाउंट बन सकता है, तो सोचिए आम आदमी कितना सुरक्षित है?

आज पलामू में सामने आया मामला सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सिस्टम की बड़ी पोल खोलता है। अगर अपराधी इतने बेखौफ हैं कि वे सीधे पुलिस अधिकारी की पहचान का दुरुपयोग कर सकते हैं, तो आम नागरिक को किसी भी फर्जी केस, ठगी या साजिश में फँसाना उनके लिए कितना आसान हो सकता है — यह सवाल हर व्यक्ति को डराने के लिए काफी है।

❓ क्या हमारी डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है?
❓ क्या पहचान सत्यापन का कोई मजबूत तंत्र नहीं है?
❓ जब सिस्टम खुद सुरक्षित नहीं, तो आम जनता कैसे भरोसा करे?

सच्चाई यह है कि आज के दौर में सिर्फ अपराधी ही नहीं, बल्कि तकनीक का गलत इस्तेमाल भी सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। एक फर्जी नंबर, एक नकली प्रोफाइल — और किसी की प्रतिष्ठा, पैसा, या आज़ादी तक खतरे में पड़ सकती है।

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👉 जरूरत है जागरूकता की
👉 जरूरत है मजबूत साइबर सिस्टम की
👉 जरूरत है जवाबदेही तय करने की

जब तक व्यवस्था में खामियाँ रहेंगी, तब तक आम आदमी असुरक्षित महसूस करेगा। सवाल उठाना गलत नहीं — बल्कि यही लोकतंत्र की ताकत है।

✍️ जागरूक रहें, सतर्क रहें, और हर संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस को दें।

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